फूल (कविता)

जब लबों ने लिहाज़ किया तो आखों ने किये इशारे,

दिल से दिल की बात पहुँचे फूलों के सहारे।


फूल डाकिये हैं पहुँचाते हैं जज़्बातों को,

जो बयाँ न कर सके, कहते हैं उन बातों को।


खिलखिलाते हैं ख़ुशी में चार चाँद लगाते हैं,

सूख जाते हैं ग़म में आँसू पोंछने आते हैं।


ख़ता हुई हो तो बनके माफ़ीनामा जाते हैं,

कुंद करते तलवार, सुलहनामा लिखाते हैं।


इज़हार-ए-इश्क़ में घबराते हैं फूल

इक़रार-ए-इश्क़ में मुस्कुराते हैं फूल 

इनकार-ए-इश्क़ में मुरझाते हैं फूल 

टकरार-ए-इश्क़ में जल जाते हैं फूल 


फूल सहानुभूति हैं,

अथ और इति हैं।

तम में ज्योति हैं,

फूल जागृति हैं।

फूल भक्ति हैं,

फूल शक्ति हैं।


-काशी की क़लम

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